पर्यावरण

यही धरातल जिसमें जन्मा तू
इसी धरा पर मिल जाएगा तू
कौन सी भक्ति में लिप्त इंसा तू
थोड़ा तो अब इंसा बन जा तू

पहाड़ों की सुंदरता ही बस बची कुछ
शहरों को काले धुओं में झोंक चुका तू
केसे बन गया इतना नर्दयी मानव
रोज़ खेलता है अपने ही घरोंदे से तू

है प्रलय का तुझे गर अब भी ज्ञात नहीं
लगा चुका पर्यावरण को प्रगति की भेंट तू
इतना नेत्रहीन तू हुए केसे मानव
मृदा को बंजर कर गया है तू

देख प्रकृति का अपना प्रलय हर तरफ
जिस चौंध के लिए बिक गया तू
एक सूक्ष्मजीव से जान बचाता मानव
अपनी कर्मों से अपना ही मुंह छुपाता तू

—- हेमन्त कोहली

दिल की ख़लिश

है सिर्फ इतना ही तो होता क्यूँ है

बेमुरव्वत बेवक़्त ही होता क्यूँ है

इश्क़ है सुना ख़ुदा की इबादात

फ़िर दर्द इसमें इतना होता क्यूँ है

ख़लिश सी उठीती है

अश्क़ों सी नदी बहती है

कोई तो बन जाता है अपना सा

फिर वो इस हाल में छोड़ जाता क्यूँ है

है सिर्फ़ इतना सा तो होता क्यूँ है

तूफ़ान सा उठता भी है

दर्द का दरिया बहता भी है

कोई तो ख़्वाब है अपना सा

फ़िर पतों सा भिखर जाता क्यूँ है

है सिर्फ़ इतना सा तो होता क्यूँ है

आह दिलोँ में होती भी है

अश्कों की बारिश होती भी है

कोई तो रहनुमा है अपना सा

फ़िर रक्स सा दिल में उतर जाता क्यूँ है

है सिर्फ़ इतना सा तो होता क्यूँ है

गुरूर

मैं खुद ही ख़ुदा हो जाऊं

है कैसा मुझ में ये गुरूर

ख़ुद का दुश्मन बन जाऊं

जहाँ को भी दफ़्न कर आऊँ

ये कैसा है बन गया इंसान

कौन सा ख़ुदा का दर्स

ना सोचा होगा उसने की इंसां

ऐसी भी कर लेगा शक़्ल दर्ज़

लहू का प्यासा हुआ क्यूं

क्यूं नफ़रत हैं जेहन में पाली

वो कौन सा है इबादत का क़ानून

जो जन्नत के बदले मांगे है लहू

कब पड़ लिया ऐसा कलमा

कौन दे गया ये फ़ज़ालिते

जो मेरा ही है हूबहू

मेरे ही हातों रंगा उसका लहू

मुझे फ़िर बना दे शीर खोवार

नहीं कबूल बनना वहशी दरिंदा

गुज़रा इश्क़

जहाँ तुमसे हो गई थी ख़तम

वो इश्क़ की दास्तां ज़ानिब

मैं अब भी उस राह का

मुसाफ़िर बन मंज़िल पे हूँ क़ायम

तो क्या अब इक तरफ़ा हो गया

मंज़िल का ये रास्ता

तौफ़ीक़ तो अब भी बरकरार है मेरी

तुझे गैरों से हस्ता हुआ देखा था

यहाँ तो ज़ख़्म जुदाई के अब भी हैं जवां

मैं कुछ रोज़ हो आता हूँ उन्न गलियारों से

जहां अब भी हँसी जवां मोहहबत है क़ायम

ये अब बात कुछ और है की तुम ग़ैर के क़रीब

और मैं एक तरफ़ा मोहब्बत में हूँ क़ायम

वक़्त अपने ही दिखाता है रौब

है इश्क़ गुज़रा ही सही हमारा तो क्या

जलाल आज भी मुझ से है क़ायम

ख़ुदा जिसे समझा वो पत्थर तो नहीं था

वस्ल की रात तो आज भी है क़ायम

गुमनाम लम्हें

समँदर की लहरों सा

उनका आना और जाना

रेत में हमारा नाम

यूँ मिट जाना

कुछ तो साज़िशें करता होगा

मुझसे ये ज़माना

लहरें छूने को तड़प उठीती होंगी

याद कर अजनबियों का फ़साना

रोज़ का वहीँ मिलना, रोज़ ही बिछड़ जाना

वो रेत पे निशाँ छोड़ते क़दम

लहरों का उन्हें बेवज़ह मिटा जाना

रोज़ उस मंज़र पे मोहहबत हो जाना

सहर होते बस यादोँ का रह जाना

अभी कुछ रोज़ पहले ही जवां थीं

ख़्वाहिशों का यूँ बेवक़्त दफ़न हो जाना

अब तो ढूंढ ही लिया है उन्न लम्हों ने

ज़हन में आना और रुख्सत हो जाना

दायरा

रिश्तों के कुछ नाम हों

मेरे मोहहले के लिए ही सही

उन्न कुछ चुनिंदा लोगों के लिए

मेरी घुटन के कुछ नाम तो हों

है कौन वो जो मेरे होने का हक़

इतने हक़ से जताते हैं

गर उनके साथ नहीं तो

अजनबी सा चेहरा दिखा जातें हैं

मेरी साँसों को उनका कर्ज़ दिखा

रोज़ उधार सा कुछ मांग लेते हैं

ख़ुद उनका कुछ झुलस सा रहा

फ़िर मुझे ख़ाक करने का सबब क्या

कुछ दुआ सलाम के चलते

क्यों मेरा ज़ायका उनके ज़ायके सा हो

मुझे क्यूं उनके सा है जीना

जब मेरी मंज़िल का वो हिस्सा नहीं

है वो कौन जो मेरे जीने का दायरा तय करें

मुझे ख़ुदा ने नवाज़ा मेरे जीने का रास्ता

मुझसे ही तय औऱ मुझसे ही ख़त्म हो।