गुरूर

मैं खुद ही ख़ुदा हो जाऊं है कैसा मुझ में ये गुरूर ख़ुद का दुश्मन बन जाऊं जहाँ को भी दफ़्न कर आऊँ ये कैसा है बन गया इंसान कौन सा ख़ुदा का दर्स ना सोचा होगा उसने की इंसां ऐसी भी कर लेगा शक़्ल दर्ज़ लहू का प्यासा हुआ क्यूं क्यूं नफ़रत हैं जेहन …

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