SafarTheJourney

गुज़रा इश्क़

जहाँ तुमसे हो गई थी ख़तम

वो इश्क़ की दास्तां ज़ानिब

मैं अब भी उस राह का

मुसाफ़िर बन मंज़िल पे हूँ क़ायम

तो क्या अब इक तरफ़ा हो गया

मंज़िल का ये रास्ता

तौफ़ीक़ तो अब भी बरकरार है मेरी

तुझे गैरों से हस्ता हुआ देखा था

यहाँ तो ज़ख़्म जुदाई के अब भी हैं जवां

मैं कुछ रोज़ हो आता हूँ उन्न गलियारों से

जहां अब भी हँसी जवां मोहहबत है क़ायम

ये अब बात कुछ और है की तुम ग़ैर के क़रीब

और मैं एक तरफ़ा मोहब्बत में हूँ क़ायम

वक़्त अपने ही दिखाता है रौब

है इश्क़ गुज़रा ही सही हमारा तो क्या

जलाल आज भी मुझ से है क़ायम

ख़ुदा जिसे समझा वो पत्थर तो नहीं था

वस्ल की रात तो आज भी है क़ायम

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