गुज़रा इश्क़

जहाँ तुमसे हो गई थी ख़तम वो इश्क़ की दास्तां ज़ानिब मैं अब भी उस राह का मुसाफ़िर बन मंज़िल पे हूँ क़ायम तो क्या अब इक तरफ़ा हो गया मंज़िल का ये रास्ता तौफ़ीक़ तो अब भी बरकरार है मेरी तुझे गैरों से हस्ता हुआ देखा था यहाँ तो ज़ख़्म जुदाई के अब भी …

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