गुमनाम लम्हें

समँदर की लहरों सा उनका आना और जाना रेत में हमारा नाम यूँ मिट जाना कुछ तो साज़िशें करता होगा मुझसे ये ज़माना लहरें छूने को तड़प उठीती होंगी याद कर अजनबियों का फ़साना रोज़ का वहीँ मिलना, रोज़ ही बिछड़ जाना वो रेत पे निशाँ छोड़ते क़दम लहरों का उन्हें बेवज़ह मिटा जाना रोज़ …

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