गुरूर

मैं खुद ही ख़ुदा हो जाऊं है कैसा मुझ में ये गुरूर ख़ुद का दुश्मन बन जाऊं जहाँ को भी दफ़्न कर आऊँ ये कैसा है बन गया इंसान कौन सा ख़ुदा का दर्स ना सोचा होगा उसने की इंसां ऐसी भी कर लेगा शक़्ल दर्ज़ लहू का प्यासा हुआ क्यूं क्यूं नफ़रत हैं जेहन …

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गुज़रा इश्क़

जहाँ तुमसे हो गई थी ख़तम वो इश्क़ की दास्तां ज़ानिब मैं अब भी उस राह का मुसाफ़िर बन मंज़िल पे हूँ क़ायम तो क्या अब इक तरफ़ा हो गया मंज़िल का ये रास्ता तौफ़ीक़ तो अब भी बरकरार है मेरी तुझे गैरों से हस्ता हुआ देखा था यहाँ तो ज़ख़्म जुदाई के अब भी …

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गुमनाम लम्हें

समँदर की लहरों सा उनका आना और जाना रेत में हमारा नाम यूँ मिट जाना कुछ तो साज़िशें करता होगा मुझसे ये ज़माना लहरें छूने को तड़प उठीती होंगी याद कर अजनबियों का फ़साना रोज़ का वहीँ मिलना, रोज़ ही बिछड़ जाना वो रेत पे निशाँ छोड़ते क़दम लहरों का उन्हें बेवज़ह मिटा जाना रोज़ …

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