गुरूर

मैं खुद ही ख़ुदा हो जाऊं

है कैसा मुझ में ये गुरूर

ख़ुद का दुश्मन बन जाऊं

जहाँ को भी दफ़्न कर आऊँ

ये कैसा है बन गया इंसान

कौन सा ख़ुदा का दर्स

ना सोचा होगा उसने की इंसां

ऐसी भी कर लेगा शक़्ल दर्ज़

लहू का प्यासा हुआ क्यूं

क्यूं नफ़रत हैं जेहन में पाली

वो कौन सा है इबादत का क़ानून

जो जन्नत के बदले मांगे है लहू

कब पड़ लिया ऐसा कलमा

कौन दे गया ये फ़ज़ालिते

जो मेरा ही है हूबहू

मेरे ही हातों रंगा उसका लहू

मुझे फ़िर बना दे शीर खोवार

नहीं कबूल बनना वहशी दरिंदा

गुज़रा इश्क़

जहाँ तुमसे हो गई थी ख़तम

वो इश्क़ की दास्तां ज़ानिब

मैं अब भी उस राह का

मुसाफ़िर बन मंज़िल पे हूँ क़ायम

तो क्या अब इक तरफ़ा हो गया

मंज़िल का ये रास्ता

तौफ़ीक़ तो अब भी बरकरार है मेरी

तुझे गैरों से हस्ता हुआ देखा था

यहाँ तो ज़ख़्म जुदाई के अब भी हैं जवां

मैं कुछ रोज़ हो आता हूँ उन्न गलियारों से

जहां अब भी हँसी जवां मोहहबत है क़ायम

ये अब बात कुछ और है की तुम ग़ैर के क़रीब

और मैं एक तरफ़ा मोहब्बत में हूँ क़ायम

वक़्त अपने ही दिखाता है रौब

है इश्क़ गुज़रा ही सही हमारा तो क्या

जलाल आज भी मुझ से है क़ायम

ख़ुदा जिसे समझा वो पत्थर तो नहीं था

वस्ल की रात तो आज भी है क़ायम

गुमनाम लम्हें

समँदर की लहरों सा

उनका आना और जाना

रेत में हमारा नाम

यूँ मिट जाना

कुछ तो साज़िशें करता होगा

मुझसे ये ज़माना

लहरें छूने को तड़प उठीती होंगी

याद कर अजनबियों का फ़साना

रोज़ का वहीँ मिलना, रोज़ ही बिछड़ जाना

वो रेत पे निशाँ छोड़ते क़दम

लहरों का उन्हें बेवज़ह मिटा जाना

रोज़ उस मंज़र पे मोहहबत हो जाना

सहर होते बस यादोँ का रह जाना

अभी कुछ रोज़ पहले ही जवां थीं

ख़्वाहिशों का यूँ बेवक़्त दफ़न हो जाना

अब तो ढूंढ ही लिया है उन्न लम्हों ने

ज़हन में आना और रुख्सत हो जाना