वक़्त

कभी उलझता सा

कभी सुलझता सा

कभी बिगड़ता सा

कभी संवरता सा

जाने ये वक़्त क्यूं मुझसे

आंख मिलचोली करता सा

कभी बचपन का

कभी लड़खपन का

जाने क्या क्या रंग दिखता सा

कभी हाथ में मेरे

कभी हाथों से परे

अपनी अहमियत दिखता सा

कभी चलता हवा की गति

कभी धीमी धीमी नदी सा बहता

मैं दौड़ता हूँ पकड़ने को जब भी

मेरे हाथों से ओझल होता

ऐसा ये वक़्त

Published by

hemu111

Self Exploration in Every Corner of Life is my beleif and Knoweldge is Omnipresent & is to Gain my Hobby

2 thoughts on “वक़्त”

  1. बहुत खूब—-
    वक्त ऐसा ही है
    हम भाग रहे वह भगा रहा
    हंसते हैं कभी वह रुला रहा।।

    Like

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