ख़्वाब

ख़्वाबों में से एक ऐसा मेरा ख़्वाब

शिददत जैसा मेरा वो ख़्वाब

जीने का सबब उम्मीद का बांध

देखूं रोज़ तो नींद है आती

तकिये जैसा मेरा वो ख़्वाब

कभी हँसता हुआ कभी मायूस

फिर भी खिलता 

हिम्मत जैसा मेरा वो ख़्वाब

कभी मिलों दूर 

कभी बिल्कुल पास

मंजिल जैसा मेरा वो ख़्वाब

कभी राहों में जूझता

कभी गिरता पड़ता सा

आम ज़िन्दगी सा मेरा वो ख़्वाब

 इनायत कहो या उसे इबादात

मोहहबत जैसा मेरा वो ख़्वाब

सूरज सा तेज़ 

चाँद सा चंचल

दिन रात जैसा मेरा वो ख़्वाब

नींद से जागूं

या नीँद में मिल जाऊं

रगों में दौड़ता मेरा वो ख़्वाब

ज़िन्दगी हो जिसमें शरू

मौत पे भी ना ख़त्म हो

रूह जैसा मेरा वो ख़्वाब

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2 thoughts on “ख़्वाब

  1. आम ज़िन्दगी सा मेरा वो ख़्वाब
    इनायत कहो या उसे इबादात
    मोहहबत जैसा मेरा वो ख़्वाब
    bahut khub likha hai…

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