Raavan

वो हस्ता होगा देख इंसान की नादानियां

जो जला देतें हैं उसे और खुद रोज़ जलते हैं रहते

कभी गृणा की आग कभी घमंड की ज्वाला

कभी क्रोध की माला जकड़ा हुआ मूर्ख इंसान

समझता है रावण जला देने से जल गया सब मैल

जो नही जला वो है उसके मस्तिष्क का बैर

उलझ रहा है सोच रहा है दिल को रख कर खुश

खुद को समझ कर राम क्या तूने सीखा त्याग

वो भ्रात प्रेम जो होय जबतक है बचपन

वो खुद को मिटा देना जब आघात करे दुश्मन

नही आसां दुनिया में बन जाना राम 

पहले थोड़ा तोह तुम समझ लो राम

क्या तुम खुद को कहते हो रावण

शर्म से झुक जाता हूँ करते हो स्त्री वस्त्र हरण

अहंकार लिप्त ओ मानव क्या भूल गया 

तू नही है त्रेता युग में जहां राम भी रावण करता समान

जिसे कहते है कलयुग तू कर रहा उसका अपमान

सोच ठहर कुछ कर ऐसा की रह जाये तुझ में एक इंसान

युग युग तुझे याद करे ले प्रण तू कुछ ऐसा मेरी मान

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