बचपन

वो टूटे हुए मकानों में, सुने पड़े मैदानोँ में, कहीं मेरा बचपन आवाज़ देता है ज़ोर से कानों में, फ़िर से रंगीन करने आजा ओ बिछड़े मुसाफ़िर , सकून जो यहाँ है वो कहाँ तेरे मकानों में।

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